Practical Health Psychology

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उच्च-जोखिम समूहों में कोविड-19 के निदान और इलाज़ में व्यवहार विज्ञान का उपयोग

उच्च-जोखिम समूहों में कोविड-19 के निदान और इलाज़ में व्यवहार विज्ञान का उपयोग

लेखक: ट्रेसी एप्टन, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, यूके; लीसा मैरी वॉर्नर, एमएसबी मेडिकल स्कूल बर्लिन, जर्मनी; अलेक्सांद्रा लाज़िच, बेलग्रेड, सर्बिया की स्वतंत्र शोधकर्ता

कोविड-19 के उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों के साथ काम करना कभी-कभी एक साथ कई बातचीत संभालने जैसा लग सकता है। बेशक, हमें कुछ ज़रूरी मेडिकल जानकारी उन्हें देनी होती है, लेकिन मरीज़ अपने साथ भी बहुत कुछ और लेकर आते हैं, जैसे कि उनकी संस्कृति और परवरिश से बनी धारणाएँ, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पुराने अनुभव, कलंक (स्टिग्मा) का डर, अपने परिवार और जान-पहचान के लोगों से मिली अलग-अलग जानकारियाँ, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का दबाव। व्यवहार विज्ञान इन सभी उलझे हुए धागों को सुलझाने में हमारी मदद कर सकता है, और पूरी प्रक्रिया को अधिक सहज, अधिक संवेदनापूर्ण, और अधिक असरदार बना सकता है।

एक चुनौती तो बीमारी के पता चलने या निदान के उसी पल से शुरू हो जाती है। कई डॉक्टर मरीज़ को ये मुश्किल ख़बर देने को लेकर चिंतित रहते हैं, ख़ासतौर पर जब वे समय की कमी महसूस कर रहे हों या यह न जानते हों कि मरीज़ की इसपर कैसी प्रतिक्रिया होगी। दूसरी तरफ़, मरीज़ों के मन में ग़लत मिली जानकारियाँ भी हो सकती हैं, जैसे कि “टेस्ट सही नहीं होते” या “कोविड-19 अब उतना गंभीर नहीं रहा”, या फिर वे पुराने अनुभवों की वजह से स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पाते। कुछ मरीज़ों को यह डर सताता है कि इस बीमारी के पता चलने का उनकी नौकरी, उनके परिवार, या उनके समाज में क्या असर पड़ेगा।

जब हम इस बातचीत में क़दम रखते हैं, तो हम सिर्फ़ एक मेडिकल बातचीत में नहीं, बल्कि एक बेहद इंसानी दुनिया में दाख़िल हो रहे होते हैं। लोगों को अपनी सेहत के बारे में बात करना मुश्किल लग सकता है, वे यह महसूस कर सकते हैं कि उन्हें जज किया जा रहा है, या वे शर्मिंदगी महसूस कर सकते हैं, या उन्हें यह चिंता हो सकती है कि वे अपनी सेहत के बारे में ग़लत फ़ैसले ले रहे हैं। अगर वे ऐसा महसूस करते हैं, तो वे डिफ़ेंसिव रवैया अपना सकते हैं, जैसे कि इलाज़ की ज़रूरत से इनकार करना, कोविड-19 की गंभीरता को कम करके आँकना, या यह मानना कि इलाज़ असरदार नहीं है। बीमारी के बारे में बताने के समय एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल कैसे बनाएँ, ग़लत मिली जानकारियों को कैसे सुधारें, और डिफ़ेंसिव रवैये को कम करने के तरीकों के लिए स्टेप 1 देखें।

एक बार जब मरीज़ को अपनी बीमारी का पता चल जाए, तो अगली चुनौती उन्हें प्रेरित करने की होती है। सिर्फ़ जोखिम की जानकारी देने से मरीज़ों को शायद ही कभी प्रेरणा मिलती है। कई उच्च-जोखिम वाले मरीज़, ख़ासतौर पर जो सिर्फ़ हल्का बीमार महसूस कर रहे हों या जिन्हें कोई लक्षण ही न हों, यह समझ नहीं पाते कि तुरंत इलाज़ शुरू करना क्यों ज़रूरी है। कुछ मरीज़ों को यह शक होता है कि एंटीवायरल ट्रीटमेंट से फ़ायदा होगा या नहीं, या फिर वे साइड इफ़ेक्ट को लेकर चिंतित रहते हैं। कुछ मरीज़ खुद को “उच्च-जोखिम” वाला नहीं मानते, या फिर दवाओं को लेकर उनकी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यताएँ होती हैं जो इस फ़ैसले को और पेचीदा बना देती हैं। हालाँकि, इन चिंताओं को अक्सर बिहेवियर चेंज टेक्नीक्स (BCTs) की मदद से दूर किया जा सकता है (स्टेप 2 देखें)

यहाँ तक कि जब मरीज़ पूरी तरह प्रेरित भी हो, तब भी इलाज़ शुरू होने के बाद उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। वे दवा लेना भूल सकते हैं, दवा लेने के तरीके को लेकर उलझन में पड़ सकते हैं, या परिवार और काम जैसी दूसरी ज़िम्मेदारियों में उलझ सकते हैं। एक-दो दिन में बेहतर महसूस करने लगने पर भी मरीज़ दवा जल्दी बंद कर सकते हैं। इलाज़ पर टिके रहना सिर्फ़ इच्छाशक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि इलाज़ रोज़मर्रा की दिनचर्या में कितनी आसानी से फ़िट हो पाता है। इसमें पहले से की गई योजना से मदद मिल सकती है (स्टेप 3 देखें)।

कोविड-19 के पता चलने या निदान और इलाज़ के दौरान उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की मदद करना तब सबसे ज़्यादा असरदार होता है जब व्यवहार विज्ञान को सांस्कृतिक समझ के साथ जोड़ा जाए। नीचे दिए गए सुझाव इन्हीं दोनों बुनियादों पर टिके हुए हैं।

कुछ प्रैक्टिकल सुझाव

स्टेप 1: बीमारी के बारे में बताने के दौरान एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बनाएँ 

शुरुआत मरीज़ की खूबियों या मूल्यों की सराहना करके करें, इससे डिफ़ेंसिव रवैया कम होता है और आपसी तालमेल बनता है। इस तरह की डिफ़ेंसिव प्रतिक्रियाओं के जोखिम को कम करने का एक तरीका “अफ़र्मेशन” है। इसमें मरीज़ों को थोड़ा प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपनी निजी खूबियों और ज़िंदगी में अपनी अहम भूमिकाओं के बारे में सोचें, जैसे कि दूसरों के लिए एक अहम इंसान होना, एक देखभाल करने वाला जीवनसाथी होना, माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी होना, या सहकर्मी होना, बजाय इसके कि वे इन्फेक्शन से हुए नुक़सान के बारे में ही सोचते रहें। इससे उनका आत्मसम्मान बना रह सकता है और बीमारी के पता चलने या निदान और इलाज़ के अगले कदमों को स्वीकार करने की संभावना बढ़ सकती है। जब मरीज़ की तरफ़ से कोई ग़लत मिली जानकारी सामने आए, तो “फ़ैक्ट सैंडविच” की मदद से शांति से उसे सुधारें: पहले सही जानकारी बताएँ, फिर ग़लतफ़हमी का संक्षेप में ज़िक्र करें, समझाएँ कि वह ग़लत क्यों है, और फिर सही जानकारी पर वापस आ जाएँ। बातचीत को आसान और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक रखना बेहद ज़रूरी है, ख़ासतौर पर उन मरीज़ों के लिए जिनकी स्वास्थ्य साक्षरता सीमित हो या जो अपनी भाषा में इतने सहज न हों।


स्टेप 2: प्रेरणा बढ़ाने के लिए साफ़ और रोचक कम्युनिकेशन टूल्स का इस्तेमाल करें


मोटिवेशनल इंटरव्यूइंग टेक्नीक्स, जैसे कि खुले सवाल पूछना, बात को समझकर दोहराना (रिफ्लेक्टिव लिसनिंग), और अफ़र्मेशन, मरीज़ों को इलाज़ लेने के अपने कारण खुद खोजने में मदद कर सकती हैं, जो सिर्फ़ समझाने-बुझाने से कहीं ज़्यादा असरदार है। कहानियाँ, जैसे कि किसी दूसरे मरीज़ के अनुभव के बारे में कोई छोटी कहानी, या इन्फोग्राफ़िक्स या इलस्ट्रेशन जैसे विज़ुअल एड्स, जैसे कि इलाज़ के साथ और बिना इलाज़ के वायरल लोड दिखाने वाला एक आसान ग्राफ़िक, यह समझाने में मदद कर सकते हैं कि शुरुआती इलाज़ क्यों ज़रूरी है और बीमारी के बिगड़ने के जोखिम को ज़्यादा साफ़ और आसान तरीके से समझाया जा सकता है। मरीज़ों को इलाज़ के फ़ायदे और नुकसान पर खुद विचार करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसमें न सिर्फ़ उनकी अपनी सेहत का ध्यान रखा जाए, बल्कि यह भी देखा जाए कि ठीक होने से उनके परिवार और जान-पहचान के लोगों पर क्या असर पड़ेगा, जैसे कि परिवार के साथ रह पाना या क़रीबी रिश्ते बनाए रखना। ख़ासतौर पर बुज़ुर्ग मरीज़ों के लिए, इलाज़ के भावनात्मक और कम समय में दिखने वाले फ़ायदे, जैसे कि जल्दी ठीक होकर अपने नाती-पोते से मिल पाना, लॉन्ग-टर्म स्वास्थ्य लक्ष्यों (जैसे, बीमारियों के जमा होते जाने से जुड़े खतरों से बचना) के मुकाबले ज़्यादा असरदार हो सकते हैं।

स्टेप 3: प्रैक्टिकल योजना के ज़रिये इलाज़ पर टिके रहने में मदद करें


मरीज़ के साथ मिलकर एक ठोस एक्शन प्लान बनाएँ, जैसे कि दवा कहाँ रखी जाएगी, दिन की दिनचर्या में दवा लेने का सही वक़्त क्या होगा, और कौन सी चीज़ें उन्हें दवा लेने की याद दिलाएँगी। इससे इलाज़ पर टिके रहना आसान हो जाता है और याददाश्त पर निर्भरता भी कम हो जाती है। इम्प्लीमेंटेशन-इंटेंशन स्ट्रैटेजीज़ (जैसे कि “अगर दवा लेने के वक़्त मैं काम पर हूँ, तो मैं…”) इलाज़ को तब भी जारी रखने में मदद करती हैं जब रोज़मर्रा की दिनचर्या बदल जाए। पिल ऑर्गनाइज़र, अलार्म, और विज़ुअल क्यूज़ दवा लेने की आदत को बनाए रखने में मदद करते हैं। आप पहले से ही मरीज़ों को दवा लेने में आने वाली संभावित रुकावटों और उनके संभावित हल सोचने में भी मदद कर सकते हैं। उन्हें अपने परिवार और जान-पहचान के लोगों से मदद माँगने के लिए प्रोत्साहित करें, जो शायद मदद कर पाने के इस मौक़े को ख़ुशी से अपनाएँ। सबसे बढ़कर, हर कदम पर सांस्कृतिक रूप से की गई संवेदनशील देखभाल मायने रखती है। मान्यताओं, परिवार में भूमिकाओं, या पसंदीदा भाषा के बारे में पूछना यह पक्का करने में मदद करता है कि बनाई गई योजना मरीज़ को सम्मानजनक और व्यावहारिक लगे। आपसी तालमेल बनाकर, प्रेरणा देकर, और प्रैक्टिकल योजना तैयार करके, डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी ऐसे मरीज़ों के नतीजों को बेहतर कर सकते हैं और असमानताएँ कम कर सकते हैं जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

अनुवादक शेषन तिवारी

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