लेखक: डेविड साइमन्स, पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी; आयशेगुल बाकिर, हाजेट्टेपे यूनिवर्सिटी, तुर्की; योहाना नुर्मी, यूनिवर्सिटी ऑफ हेलसिंकी, फिनलैंड
आमतौर पर कोविड-19 की बात अब भूतकाल में और सिर्फ़ एक साँस से जुड़े इन्फेक्शन के रूप में की जाती है। लेकिन कोविड-19 अभी भी पूरे शरीर पर अचानक और गंभीर दबाव डालने वाली बीमारी है, ख़ासतौर पर उन उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों के लिए जिन्हें पहले से ही हृदय, मेटाबॉलिक, इम्यून, या साँस से जुड़ी बीमारियाँ हों। खतरा सिर्फ़ वायरस से नहीं है। असली खतरा वह सिलसिला है जो यह वायरस शुरू कर सकता है, जिसमें शरीर की संतुलन बनाए रखने की अंदरूनी क्षमता एक के बाद एक चरमराने लगती है।
एक डॉक्टर के रूप में, हम सब इस बीमारी की क्लिनिकल दिशा से वाकिफ़ हैं। क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (COPD) या इंटरस्टिशियल लंग डिज़ीज़ (ILD) से पीड़ित मरीज़ों में एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (ARDS) का खतरा काफ़ी हद तक बढ़ जाता है। यह खतरा मेटाबॉलिक बीमारियों से और भी ज़्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि जिन मरीज़ों का मधुमेह ठीक से काबू में नहीं है या गंभीर मोटापे से जूझ रहे हैं, ऐसे मरीज़ों में लंबे समय से चली आ रही लो-ग्रेड सूजन और रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत की कमज़ोरी (एंडोथेलियल डिसफंक्शन) शरीर को अत्यधिक सूजन वाली प्रतिक्रिया (हाइपरइन्फ्लेमेटरी रिस्पॉन्स) के लिए पहले से ही तैयार कर देती है। नतीजतन, कोविड-19 से शरीर में पैदा होने वाली यह सूजन, दिल के अचानक फेल होने (डीकम्पेन्सेटेड हार्ट फेलियर), पूरे शरीर में रक्त वाहिकाओं में थक्के जमने (माइक्रोवैस्कुलर थ्रॉम्बोसिस), या गुर्दे को अचानक नुकसान पहुँचने (एक्यूट किडनी इंजरी) जैसी गंभीर स्थितियों की वजह आसानी से बन सकती है।
इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड मरीज़ों में, इम्यून सिस्टम की अनियंत्रित प्रतिक्रिया (डिसरेगुलेटेड इम्यून रिस्पॉन्स) और वायरस का शरीर में लंबे समय तक सक्रिय रहना और बाहर फैलते रहना (प्रोलॉन्ग्ड वायरल शेडिंग) वायरस की वजह से कमज़ोर हुए शरीर में बैक्टीरियल इन्फेक्शन के पनपने (सुपरएडेड बैक्टीरियल इन्फेक्शन) के लिए एक उच्च-जोखिम वाला माहौल बना देते हैं, और यह बैक्टीरियल इन्फेक्शन बीमारी की गंभीरता को तेज़ी से कई गुना बढ़ाता चला जाता है। इसके अलावा, न्यूरोलॉजिकल पेचीदगियाँ भी पहले से ज़्यादा देखने को मिल रही हैं, जिनमें एक्यूट एन्सेफैलोपैथी और डेलीरियम शामिल हैं। बुज़ुर्गों के लिए ख़ासतौर पर, ये पेचीदगियाँ काफ़ी नुकसानदेह साबित होती हैं, क्योंकि इनसे अक्सर उनके रोज़मर्रा के कामों को करने की क्षमता (ADLs) में अचानक और गंभीर गिरावट आती है, जिससे मरीज़ की आज़ादी और आत्मनिर्भरता पर असर पड़ता है और उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती होने और लंबे समय तक गहन इलाज़ की ज़रूरत पड़ जाती है।
इन पेचीदगियों का बोझ सिर्फ़ एक मरीज़ तक सीमित नहीं रहता। जब कोई बुज़ुर्ग डेलीरियम की वजह से अपनी पहले वाली रोज़मर्रा की क्षमता खो देते हैं, या किसी इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड मरीज़ में कोविड-19 की वजह से बैक्टीरियल निमोनिया पनप जाता है, तो उन्हें बस एक छोटी सी भर्ती की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें जटिल और गहन आपातकालीन इलाज़, मल्टीडिसिप्लिनरी देखभाल, और अक्सर लंबे समय तक रिहैबिलिटेशन की ज़रूरत होती है। इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक लहर की तरह असर पड़ता है। गहन चिकित्सा इकाइयाँ (ICU) और बुज़ुर्गों की देखभाल के वार्ड भर जाते हैं, वैकल्पिक प्रक्रियाएँ रद्द हो जाती हैं, और दूसरी लंबी बीमारियों की देखभाल की निरंतरता टूट जाती है।
इसके अलावा, इन रोकी जा सकने वाली पेचीदगियों को संभालने और अचानक अपनी आज़ादी खो चुके मरीज़ों की जटिल डिस्चार्ज प्रक्रियाओं में जो लगातार दबाव झेलना पड़ता है, वह डॉक्टरों और स्टाफ में बर्नआउट और मोरल इंजरी की एक वजह बन सकता है। मोरल इंजरी वह गहरी बेबसी और फँसे होने का एहसास है जो तब पैदा होता है जब लोग ऐसे तरीकों से काम करने पर मजबूर होते हैं जो उनके नैतिक या पेशेवर मूल्यों से मेल नहीं खाते। दूसरी तरफ़, बर्नआउट काम से जुड़े दबाव, भावनात्मक थकावट, अपनी काबिलियत और उत्पादकता को लेकर शक, और लोगों से दूरी बनाने की आदत के मेल से पैदा होता है। मोरल इंजरी और बर्नआउट दोनों ही डॉक्टरों और स्टाफ में चिंता, अवसाद, और शारीरिक लक्षणों को बढ़ा सकते हैं, और मरीज़ की सुरक्षा, पेशा छोड़ने के इरादे, और स्वास्थ्य सेवाओं की समग्र गुणवत्ता पर सीधा असर डाल सकते हैं।
बिहेवियरल ब्रिज
हल्के शुरुआती इन्फेक्शन और अस्पताल में भर्ती होने के बीच की खाई अक्सर बिहेवियरल होती है। उच्च-जोखिम वाले मरीज़ इलाज़ के लिए आगे आने में देरी क्यों करते हैं, या जब एंटीवायरल और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी ट्रीटमेंट सबसे ज़्यादा असरदार होता है तब भी वे इसे लेने से क्यों मना कर देते हैं?
मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मरीज़ अक्सर बीमारी के शुरुआती दौर में अपने जोखिम का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाते। इम्यूनोसप्रेस्ड मरीज़ अपनी हल्की खाँसी को बस एक आम अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (URTI) मान सकते हैं, और इस तरह वे यह नहीं समझ पाते कि पेचीदगियों को रोकने का मौका तेज़ी से सिकुड़ता जा रहा है। इसी तरह, बुज़ुर्ग डेलीरियम के शुरुआती दौर में अपनी बिगड़ती हालत का सही आकलन नहीं कर पाते और ना ही अपने इलाज़ के लिए आगे आ पाते हैं।
इसके अलावा, जोखिम को समझने में कॉग्निटिव और इमोशनल बायसेज़ भी देरी की वजह बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, कंजेस्टिव हार्ट फेलियर से जूझ रहे मरीज़ कोविड-19 से होने वाले दर्द को सामान्य मान सकते हैं क्योंकि वे अपने पुराने सीने के दर्द के आदी हो चुके हैं। ऐसे में वे एक नए खतरे का बोझ उठाने में खुद को बेबस पाकर जोखिम को नकार भी सकते हैं। या फिर शुरुआती दौर में, ख़ासतौर पर जब लक्षण हल्के हों, वे ऑप्टिमिज़्म बायस का शिकार हो सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में, वे यह नहीं पहचान पाते कि वे एक उच्च-जोखिम वाले समूह में हैं।
इलाज़ लेने में हिचकिचाहट आज भी आम है। मरीज़ नई दवाओं पर भरोसा नहीं कर पाते, किसी पर या अपने परिवार पर “बोझ” न बनने के लिए अपने लक्षणों को कम करके आँकते हैं, या इलाज़ के लिए जटिल स्वास्थ्य व्यवस्था से गुज़रने की सोच से ही घबरा जाते हैं।
सिर्फ़ मेडिकल जानकारी से यह खाई नहीं पाटी जा सकती। अगर हम ऐसी भर्तियों को कम करना चाहते हैं जो रोकी जा सकती थीं, और अपने मरीज़ों की सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता भी बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें व्यवहार विज्ञान को अपनी रोज़मर्रा की परामर्श प्रक्रिया में सहजता से और पूरी तरह से शामिल करना होगा। हमें अपना ध्यान सिर्फ़ मेडिकल जानकारी देने से हटाकर मरीज़ों और उनकी देखभाल करने वालों में बिहेवियर चेंज को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने की तरफ़ लगाना होगा।
खास बिहेवियर चेंज टेक्नीक्स (BCTs) का इस्तेमाल करके, उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों और उनके परिवार तथा करीबी लोगों को पेचीदगियाँ गंभीर होने से पहले ही कदम उठाने के लिए सशक्त किया जा सकता है। यह सक्रिय नज़रिया मरीज़ों और उनकी देखभाल करने वालों को महज़ इलाज़ लेने वालों से अपनी सेहत में सक्रिय भागीदारी लेने वाला बना देता है, जो आख़िरकार पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता को बनाए रखने में मदद करता है।
कुछ प्रैक्टिकल सुझाव
कोविड-19 की पेचीदगियों के बोझ को कम करने के लिए, इन तीन एविडेंस-बेस्ड बिहेवियर चेंज टेक्नीक्स (BCTs) को उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों और उनकी देखभाल करने वालों के साथ अपनी परामर्श प्रक्रिया में शामिल करें:
- साथ मिलकर “सिक डे” एक्शन प्लान बनाएँ
“अगर तबियत और खराब हो तो हमें फ़ोन करें” जैसी सामान्य सलाह से बचें। उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों को, और ख़ासतौर पर डेलीरियम के खतरे वाले बुज़ुर्गों की देखभाल करने वालों को, सटीक और ठोस क्लिनिकल ट्रिगर्स की ज़रूरत होती है।
इसे कैसे अपनाएँ: मरीज़ को या उनके परिवारवालों को एक ठोस प्लान लिखकर दें या फिर बोलकर समझायें। साँस और दिमाग़ से जुड़े खतरों के लिए ट्रिगर्स तय करें, जैसे कि “अगर आपका ऑक्सीजन सैचुरेशन 92% से नीचे गिर जाए, या आपको अचानक कंफ़्यूज़न महसूस होने लगे और रोज़मर्रा के कामों में दिक्कत हो, तो तुरंत इस क्लीनिक के नंबर पर फ़ोन करें।” मधुमेह के मरीज़ों के लिए, पहले से तय “सिक डे रूल्स” को सक्रिय करें: ग्लूकोज़ जाँच कितनी बार करनी है यह तय करें (जैसे कि हर चार घंटे में जाँच) और मरीज़ को निर्देश दें कि वे तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें ताकि SGLT2 इनहिबिटर्स जैसी कुछ खास मुँह से ली जाने वाली दवाओं को रोकने पर विचार किया जा सके, और युग्लाइसेमिक कीटोएसिडोसिस से बचा जा सके। यह पक्का करें कि अगर घर पर कोई ज़रूरी उपकरण उपलब्ध हो, तो मरीज़ और उनकी देखभाल करने वाले उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना सीख चुके हों। जहाँ यह उपकरण घर पर उपलब्ध न हो, वहाँ मरीज़ और देखभालकर्ता को बताएँ कि नज़दीकी क्लीनिक या फ़ार्मेसी पर जाँच कहाँ करवाई जा सकती है।
- मरीज़ों में हिचकिचाहट दूर करने के लिए जोखिम को उनकी मौजूदा स्थिति से जोड़ें
जब मरीज़ जल्दी एंटीवायरल लेने में इसलिए हिचकिचाएँ क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके लक्षण “हल्के” हैं, तो उनकी अपनी मौजूदा बीमारी से जुड़े जोखिम को सीधे तौर पर उनके सामने रखें ताकि खतरा उन्हें असली लगे।
इसे कैसे अपनाएँ: “कोविड-19 खतरनाक है” जैसी सामान्य बात कहने के बजाय, जोखिम को उनकी मौजूदा स्थिति से जोड़ें, जैसे कि “क्योंकि आपका इम्यून सिस्टम कमज़ोर या कम सक्रिय है, यह वायरस आसानी से एक गंभीर बैक्टीरियल निमोनिया को पनपने का मौका दे सकता है, भले ही अभी आपके गले में बस हल्की खराश ही हो। यह दवा शरीर में वायरस को बढ़ने से रोकने और उन्हें कम करने में मदद करती है इससे पहले कि वे बैक्टीरिया कोई स्थायी नुकसान पहुँचा सकें।”
- परिवार और देखभालकर्ताओं को एक्शन प्लान में शामिल करें
संवेदनशील मरीज़ अक्सर इलाज़ में देरी इसलिए करते हैं क्योंकि बीमार होने के साथ-साथ अस्पताल में इलाज़ ढूँढना बहुत थका देने वाला होता है, या उनमें हुआ एक्यूट कॉग्निटिव डिक्लाइन उन्हें कदम उठाने से रोक देता है।
इसे कैसे अपनाएँ: एक नियमित आउटपेशेंट विज़िट के दौरान पूछें, “अगर कल आपका कोविड टेस्ट पॉज़िटिव आ जाए, तो आपको फ़ार्मेसी या क्लीनिक तक कौन ले जाएगा?” एक “केयर चैंपियन” (परिवार का कोई सदस्य, पड़ोसी) की पहचान करें और उन्हें एक्शन प्लान में शामिल करें। यह बुज़ुर्गों के लिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अगर किसी तय देखभालकर्ता को डेलीरियम के संकेत पता हों, तो मरीज़ की हालत का बिगड़ना समय रहते पहचाना जा सकता है, और स्वास्थ्य व्यवस्था में देरी का इंतज़ार किए बिना उनके इलाज़ के लिए तुरंत कदम उठाए जा सकते हैं।
अनुवादक: शेषन तिवारी