लेखक: एस्टिन सोकांग, यूनिवर्सितास क्रिस्टेन क्रिडा वचाना, इंडोनेशिया; त्रियाना केसुमा देवी, यूनिवर्सितास ऐरलंग्गा, इंडोनेशिया; यूहांग झू, शानदोंग सेकंड मेडिकल यूनिवर्सिटी, चीन; गिल टेन होर, मास्ट्रिख्ट यूनिवर्सिटी, नीदरलैंड्स
ज़्यादातर वयस्कों में, कोविड-19 हल्की बीमारी जैसे थकान, खाँसी, या मामूली बुखार तक ही सीमित रहता है। लेकिन, ऐसे लोग जिनको पहले से ही कुछ खास स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हों, उनमें यह इन्फेक्शन अस्पताल में भर्ती होने या गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है। इसलिए ऐसे मरीज़ों की जल्दी पहचान करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि कोविड-19 के लक्षण शुरू होने के तुरंत बाद शुरू किया गया इलाज़ ही सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है।
हाल के आँकड़े लगातार बताते हैं कि बढ़ती उम्र और पहले से मौजूद बीमारियाँ जैसे कि हृदय या रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियाँ, मधुमेह, मोटापा, लंबे समय से चली आ रही फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, और कमज़ोर या कम सक्रिय इम्यून सिस्टम कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार होने के खतरे को बढ़ा देते हैं। बुज़ुर्ग और वे लोग जो पहले से कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, इस इन्फेक्शन से होने वाले गंभीर परिणामों के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं।
हालाँकि लक्षण शुरू होने के पाँच दिनों के भीतर दी जाने वाली एंटीवायरल थेरेपी गंभीर परिणामों को रोकने में सबसे अधिक प्रभावी होती है, फिर भी उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की जल्द से जल्द पहचान करना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ संवेदनशील लोगों के शरीर में वायरस लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है (प्रोलॉन्ग्ड वायरल रेप्लिकेशन), और ऐसे में देर से शुरू किया गया इलाज़ भी उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकता है। हालाँकि भारत में इन दवाओं की उपलब्धता अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग-अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय उपलब्धता के बारे में पहले से जानकारी रखना ज़रूरी है।
उच्च-जोखिम वाले मरीज़ कभी-कभी नज़रअंदाज़ क्यों हो जाते हैं
कोविड-19 के इलाज़ के लिए स्पष्ट क्लिनिकल दिशानिर्देश मौजूद होने के बाद भी, कई मरीज़ जिन्हें इलाज़ मिलना चाहिए, उनकी समय से पहचान नहीं हो पाती और जल्दी इलाज़ नहीं मिल पाता। डॉक्टर अक्सर मरीज़ के अंदरूनी जोखिम के बजाय मौजूदा लक्षणों की गंभीरता पर ही ध्यान देते हैं। हल्के लक्षणों के साथ आने वाले मरीज़ों में डॉक्टरों को अक्सर गहराई में जाकर जाँच करने की ज़रूरत नहीं लगती, भले ही उनकी पहले से मौजूद बीमारियाँ कोविड-19 से होने वाली पेचीदगियों की संभावना को बढ़ा रही हों।
इसके अलावा, कोविड-19 से जुड़ा जोखिम अक्सर किसी एक बड़ी बीमारी से नहीं, बल्कि कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं से पैदा होता है जो अकेले उतनी गंभीर नहीं लगतीं। क्लिनिकल दिशानिर्देश इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं की संख्या कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार पड़ने के खतरे को काफ़ी हद तक बढ़ा देती है, और इसीलिए, किसी एक समस्या को अलग से देखने के बजाय मरीज़ के पूरे जोखिम को मिलाकर देखा जाना चाहिए, जैसे कि उनकी बढ़ती उम्र, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), और अधिक वजन।
इसके अलावा, डॉक्टरों की व्यस्तता और समय का अभाव भी उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की समय पर पहचान में अहम भूमिका निभाता है। डॉक्टरों को अक्सर अधूरी जानकारी के आधार पर फ़ैसले लेने पड़ते हैं, जैसे कि मरीज़ की बीमारियों का अधूरा इतिहास या ऐसे चिकित्सा रिकॉर्ड या पर्चे जिनमें ज़रूरी जोखिम स्पष्ट तरीके से दर्ज न हो। नतीजतन, जब जोखिम तुरंत ज़ाहिर न हों, तो ज़रूरी क्लिनिकल संकेतों को पहचानने में चूक हो सकती है।
इसके पीछे व्यवस्थागत और व्यवहार संबंधी बाधाएँ भी होती हैं जो यह तय करती हैं कि किसे समय पर इलाज़ मिलता है। महामारी के दौरान हुई रिसर्च से पता चलता है कि सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित और हाशिये पर रहने वाले समुदायों में कोविड-19 से बीमार पड़ने, अस्पताल में भर्ती होने और मरने की दर अधिक रही है। ये असमानताएँ काफ़ी हद तक इन समुदायों की स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज़ तक सीमित पहुँच से जुड़ी हुई हैं।
मरीज़ खुद भी कई बार इलाज़ में देरी कर देते हैं। उन्हें लगता है कि हल्के लक्षणों का मतलब कोई खतरा नहीं, या कई बार तो वो इस बात से भी अनजान होते हैं कि कोविड-19 में जल्दी शुरू किया गया इलाज़ सबसे ज़्यादा असरदार होता है। डॉक्टर से स्पष्ट सलाह के अभाव में ये मरीज़ कई बार इतनी देर से पहुँचते हैं कि इलाज़ उतना कारगर नहीं रह पाता।
इसके अलावा, समय के साथ कोविड-19 के जोखिम के प्रति बदलते नज़रिये का भी इसमें योगदान हो सकता है। महामारी के शुरुआती दौर में जोखिम के प्रति जागरूकता काफ़ी ज़्यादा थी, जिससे सभी अधिक सतर्क रहते थे। जैसे-जैसे हालात बेहतर होते गए, हल्के लक्षणों वाले मामले कम ज़रूरी लगने लगे, और मरीज़ों और डॉक्टरों दोनों में जोखिम को गंभीरता से परखने की प्रेरणा भी कम होती गई।
व्यवहार विज्ञान मरीज़ की बेहतर पहचान में कैसे मदद कर सकता है
पहली नज़र में, यह चुनौती पूरी तरह से क्लिनिकल लग सकती है। लेकिन व्यवहार विज्ञान कई ऐसे प्रैक्टिकल तरीके मुहैया करवाता है जो डॉक्टरों को उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की पहचान लगातार और भरोसेमंद तरीके से करने में मदद कर सकते हैं। डॉक्टरों को अक्सर एक साथ कई तरह की जानकारियों को ध्यान में रखते हुए फ़ैसले लेने पड़ते हैं, जिससे उन पर काफ़ी कॉग्निटिव लोड रहता है। प्रॉम्प्ट और चेकलिस्ट के ज़रिये फ़ैसलों को आसान बनाने से डॉक्टर ज़रूरी जोखिमों को एक व्यवस्थित तरीके से देख सकते हैं, इससे उनकी याददाश्त और अनुमान पर निर्भरता कम हो सकती है और उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की पहचान बेहतर हो सकती है। अगर इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध हों तो वे भी मरीज़ की जल्दी पहचान करने में मदद कर सकते हैं। जहाँ यह सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ ऑटोमैटिक अलर्ट का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। ये अलर्ट बढ़ती उम्र, लंबे समय से चली आ रही बीमारी, या कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली जैसे जोखिमों वाले मरीज़ों को फ़्लैग करके डॉक्टरों को यह जल्दी तय करने में मदद कर सकते हैं कि मरीज़ को इलाज़ की ज़रूरत है या नहीं।
कोविड-19 से जुड़े खतरे और उसमें जल्दी शुरू किए गए इलाज़ की अहमियत के बारे में अगर स्पष्ट बातचीत की जाये तो मरीज़ों की जल्दी पहचान करने में मदद मिल सकती है। मरीज़ जब अपने जोखिम को समझते हैं, तो उनमें पॉज़िटिव आने पर लक्षणों के बिगड़ने का इंतज़ार करने के बजाय, डॉक्टर से जल्दी संपर्क करने की संभावना ज़्यादा बढ़ जाती है।
इसके अलावा, कुछ सटीक सवाल पूछना (जैसे कि “कौन-सी बातें हो सकती हैं जो आपके लिए जल्दी इलाज़ लेना मुश्किल बना सकती हैं?”) या इलाज़ तक पहुँचने में आने वाली दिक्कतों के बारे में बात करने से भी मरीज़ों की छिपी हुई दिक्कतें समझी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, मरीज़ को इलाज़ के लिए प्रोत्साहन देने में, “आपको डॉक्टर से मिलने के बारे में सोचना चाहिए” जैसी सामान्य सलाह अक्सर कम असरदार होती है। इसके मुकाबले, “आप इस हफ़्ते अपने नज़दीकी या फ़ैमिली डॉक्टर, क्लीनिक, या सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जा सकते हैं, और अगर ज़रूरत हो तो मैं आपको पास में क्लीनिक या डॉक्टर ढूँढने में मदद कर सकता हूँ” जैसी ठोस सलाह ज़्यादा कारगर साबित हो सकती है।
अपने फ़ैसलों पर खुद सवाल उठाने की आदत (रिफ्लेक्टिव प्रैक्टिस) से भी अनजाने में होने वाले पक्षपात (इम्प्लीसिट बायस) को पहचानने और उससे निपटने में मदद मिल सकती है। इसके लिए बस यह सवाल काफ़ी है, “क्या मैं एक जैसी क्लिनिकल स्थिति वाले किसी दूसरे मरीज़ को भी वही सलाह देता या उसके इलाज़ के बारे में भी वही फ़ैसला लेता?” इस तरह के सरल सवाल देखभाल के समय अनजाने में होने वाली असमानताओं को कम कर सकते हैं।
मुख्य बातें
कोविड-19 के उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की और बेहतर तरीके से पहचान करने के लिए ज़रूरी नहीं कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में ही कोई बड़ा बदलाव लाया जाए। डॉक्टरी प्रक्रियाओं, जाँच के तरीकों, और मरीज़ों से बातचीत में छोटे-छोटे बदलाव भी अक्सर बड़ा फ़र्क डाल सकते हैं। क्लिनिकल दिशानिर्देशों को व्यवहार विज्ञान की सूझ-बूझ के साथ जोड़कर, डॉक्टर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों की समय पर पहचान हो सके और इलाज़ के लिए उनकी जाँच हो सके। कोविड-19 और भविष्य में आने वाले संक्रामक रोगों के प्रकोप में, क्लिनिकल अभ्यास में किए गए ये छोटे-छोटे सुधार भी लोगों में गंभीर बीमारी को रोकने और संभवतः उनकी जान बचाने में मदद कर सकते हैं।
कुछ प्रैक्टिकल सुझाव
- कोविड-19 परामर्श के दौरान एक छोटी जोखिम-स्क्रीनिंग चेकलिस्ट का इस्तेमाल करें
किसी भी परामर्श के दौरान या उससे पहले ही, ऐसे मरीज़ जिनका कोविड-19 टेस्ट पॉज़िटिव आया हो या जिनमें इसके लक्षण दिखाई दे रहे हों, उनमें बढ़ती उम्र, हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, लंबे समय से चली आ रही फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, या कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली जैसे सामान्य जोखिमों का तुरंत आकलन करें। यह तरीका अपनाने से संवेदनशील मरीज़ों के छूट जाने का खतरा कम हो सकता है, ख़ासतौर पर तब, जब मरीज़ ज़्यादा हों।
- किसी एक बीमारी को नहीं, बल्कि सभी जोखिमों को देखें
कोविड-19 से जुड़ा जोखिम अक्सर किसी एक बड़ी बीमारी से नहीं, बल्कि कई ऐसी मध्यम स्तर की स्वास्थ्य समस्याओं से मिलकर पैदा होता है जो अकेले उतनी गंभीर नहीं लगतीं। इसलिए ये तय करते समय कि इलाज़ के लिए एंटीवायरल की ज़रूरत है या नहीं, किसी एक बीमारी या समस्या को अलग से देखने के बजाय मरीज़ की पूरी स्थिति पर ध्यान दें, जैसे कि उनकी उम्र, पहले से मौजूद बीमारियाँ, और मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति।
- इलाज़ की समयसीमा के अंदर मरीज़ की जल्दी जाँच को प्राथमिकता दें
कोविड-19 के लक्षण दिखाई देते ही शुरू कर दिया गया इलाज़ सबसे ज़्यादा असरदार होता है। इसलिए कोविड-19 पॉज़िटिव आने वाले उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों के लिए ऐसी स्पष्ट डॉक्टरी प्रक्रियाएँ बनाएँ जिससे उन्हें इलाज़ के लिए जल्दी से जल्दी जाँचा जा सके, जैसे कि जहाँ संभव हो उसी दिन मरीज़ को देखना, उनके ट्रायज के लिए निर्धारित रास्ते बनाना, या जहाँ उपलब्ध हो वहाँ इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड में ऑटोमैटिक अलर्ट जारी करना।
- मरीज़ों को उनके जोखिम के बारे में साफ़ तरीके से और आगे बढ़कर बताएँ
लंबे समय से चली आ रही बीमारियों वाले कई मरीज़ों को अक्सर यह पता नहीं होता कि उन्हें कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार पड़ने का खतरा ज़्यादा है। इसलिए उन्हें खुद आगे बढ़कर बताएँ कि उनकी कौन सी स्वास्थ्य समस्याएँ इस खतरे को बढ़ा रही हैं, और उन्हें और उनके परिवारवालों को भी प्रेरित करें कि कोविड-19 पॉज़िटिव आने पर या लक्षण दिखाई देने पर जल्दी से जल्दी डॉक्टर से संपर्क करें।
- इलाज़ से जुड़े फ़ैसलों के लिए एक मानक बनाएँ
कोविड-19 के इलाज़ से जुड़े सभी फ़ैसलों के लिए ट्रायज और क्लिनिकल स्कोरिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हुए एक मानक बनाएँ, ताकि सिर्फ़ अनुमान या अनुभव के आधार पर फ़ैसले न लिए जाएँ। यह तय करने से पहले कि मरीज़ को आगे की जाँच या इलाज़ की ज़रूरत नहीं है, एक पल रुकें और खुद से पूछें, “क्या मैं इसी तरह की क्लिनिकल स्थिति और बीमारियों वाले किसी दूसरे मरीज़ के लिए भी यही फ़ैसला लेता?” इस तरह रुककर खुद से सवाल पूछने की आदत देखभाल के समय अनजाने में होने वाली असमानताओं को कम करने और यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है कि इलाज़ से जुड़े फ़ैसले सिर्फ़ मरीज़ की ज़रूरत पर ही आधारित हों, और न कि किसी अनुमान पर।
अनुवादक: शेषन तिवारी