Practical Health Psychology

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कोविड-19 के उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों में जल्दी इलाज़ शुरू करने की अहमियत और उसके बेहतर फ़ायदे

कोविड-19 के उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों में जल्दी इलाज़ शुरू करने की अहमियत और उसके बेहतर फ़ायदे

लेखक: इरेम बेरना ग्यूवेंच एर्दोआन, मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी, तुर्की; ईगा पलाच-पोबोरचिक, एसडब्ल्यूपीएस यूनिवर्सिटी, पोलैंड; ओल्गा पेर्स्की, स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी, स्वीडन; शेषन तिवारी, साइफोल्क्स एजुकेशन, भारत; बेल्गिन यूनाल, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन, यूएसए

कोविड-19 में ज़्यादातर लोग बिना किसी गहन इलाज़ के ही ठीक हो जाते हैं। आमतौर पर देखभाल और लक्षणों के हिसाब से इलाज़ ही काफ़ी होता है। हालाँकि, कुछ खास लोगों में, जैसे कि बुज़ुर्ग लोग, ऐसे लोग जिन्हें टीका न लगा हो, और ऐसे लोग जो किसी लंबी बीमारी से जूझ रहे हों, गंभीर बीमारी होने का खतरा काफ़ी ज़्यादा होता है। इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ऐसे उच्च-जोखिम वाले लोगों में जल्दी इलाज़ शुरू करने पर ज़ोर देता है, ताकि उन्हें अस्पताल में भर्ती होने, गहन इलाज़ की नौबत आने, या मरने से बचाया जा सके।

कुछ खास मरीज़ों के लिए एंटीवायरल ट्रीटमेंट की सलाह दी जाती है, जो गंभीर बीमारी के खतरे को काफ़ी हद तक कम कर सकता है, और यह इलाज़ लक्षण शुरू होने के पहले पाँच दिनों के भीतर ही सबसे ज़्यादा असरदार होता है। मरीज़ की जाँच, निदान, या इलाज़ में देरी होने से इन थेरेपीज़ का असर काफ़ी हद तक कम हो सकता है। इसलिए, ख़ासतौर पर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, और स्थानीय क्लीनिकों में, इलाज़ तक जल्दी पहुँच पक्की करना बेहद ज़रूरी है, ताकि मरीज़ों को इलाज़ का ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा मिल सके और उनकी सेहत में सुधार हो सके।

अस्पताल में भर्ती होने और मरने के खतरे को कम करने में जल्दी इलाज़ की अहमियत: कॉन्टेक्स्ट-स्पेसिफिक एविडेंस

कोविड-19 में जल्दी शुरू किया गया इलाज़, ख़ासतौर पर गंभीर रूप से बीमार हो सकने वाले उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों में अस्पताल में भर्ती होने और मरने के खतरे को काफ़ी हद तक कम कर देता है। यह समझने के लिए कि जल्दी शुरू किया गया इलाज़ इतना ज़रूरी क्यों है, हमें उपलब्ध जानकारी को उसके खास क्लिनिकल और आबादी संबंधी संदर्भ में देखना होगा। अमेरिका, ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीका, भारत, और मेक्सिको सहित कई देशों में किए गए एक बड़े रैंडमाइज़्ड क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि जिन उच्च-जोखिम और बिना टीके वाले वयस्क मरीज़ों को लक्षण शुरू होने के पहले तीन दिनों के भीतर एंटीवायरल ट्रीटमेंट मिला, उनमें प्लेसबो की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने या मरने की संभावना लगभग 89% कम थी।

इसी तरह, सोट्रोविमैब (जो कि एक टार्गेटेड एंटीबॉडी थेरेपी है) से जल्दी इलाज़ शुरू करने पर कोविड-19 बीमारी के बढ़ने का खतरा 85% तक कम पाया गया (यह शुरुआती वैरिएंट्स के दौरान था, बाद के वैरिएंट्स में इसका असर अलग-अलग रहा)। यह एक बार फिर पुख्ता करता है कि उच्च-जोखिम वाले लोगों में, ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों और मोटापे या मधुमेह के मरीज़ों में, जल्दी इलाज़ शुरू करना बेहद ज़रूरी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस अध्ययन के 60% से ज़्यादा प्रतिभागी हिस्पैनिक और लैटिनक्स समुदायों से थे, जो महामारी से असमान रूप से प्रभावित हुए थे। यह दर्शाता है कि जल्दी इलाज़ अलग-अलग सामाजिक और जनसांख्यिकीय पृष्ठभूमि में भी उतना ही असरदार हो सकता है।

इसी तरह, कई देशों में किए गए 18 रियल-वर्ल्ड अध्ययनों की एक सिस्टमैटिक रिव्यू से पता चला कि जल्दी शुरू किए गए इलाज़ से अस्पताल में भर्ती होने और मरने की दर में काफ़ी कमी आई, और यह फ़ायदा सबसे ज़्यादा तब देखा गया जब इलाज़ लक्षण शुरू होने के पाँच दिनों के भीतर शुरू किया गया। हॉन्गकॉन्ग में 87,000 से ज़्यादा मरीज़ों पर किए गए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि लक्षण शुरू होने के पहले एक-दो दिनों के भीतर इलाज़ शुरू करने से बाद में शुरू किए गए इलाज़ की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने और मरने की दर में काफ़ी हद तक कमी आई। और यह पैटर्न अलग-अलग उम्र, लिंग, और टीकाकरण की स्थिति वाले मरीज़ों में भी काफ़ी हद तक एक जैसा रहा। यह सारी जानकारी मिलकर एक सीधी सी लेकिन बेहद अहम बात को पुख्ता करती है: जल्दी शुरू किया गया इलाज़ काम करता है, और देरी से शुरू किए गए इलाज़ का असर कम होता जाता है।

लोकल गाइडलाइन्स के अनुसार उपलब्ध एंटीवायरल थेरेपीज़

यह तो साफ़ है कि इलाज़ का समय बेहद अहम है, लेकिन असल में कौन से इलाज़ उपलब्ध हैं और किसे मिलने चाहिए?

जिन वयस्क मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत न हुई हो और जिनमें कोविड-19 हल्के या मध्यम दर्जे का ही हो, उनके लिए एंटीवायरल थेरेपी सबसे ज़्यादा असरदार होती है। फ़िलहाल कोविड-19 के इलाज़ में आमतौर पर तीन मुख्य एंटीवायरल दवाएँ इस्तेमाल की जाती हैं: रेमडेसिविर, निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर, और मोलनुपिराविर, हालाँकि भारत में इनकी उपलब्धता अलग-अलग हो सकती है। इनमें से सही एंटीवायरल का चुनाव दो चीज़ों पर निर्भर करता है: मरीज़ से जुड़े पहलू, जैसे कि उनका जोखिम प्रोफ़ाइल और मौजूदा दवाएँ, और एंटीवायरल दवा से जुड़े पहलू, जैसे कि इसे देने का तरीका और इसकी स्थानीय उपलब्धता।

रेमडेसिविर को तीन दिनों तक नस के ज़रिये (इंट्रावेनस इन्फ्यूज़न) दिया जाता है और इसे तब प्राथमिकता दी जाती है जब मुँह से दवा देना सही न हो। एक रैंडमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल में यह सामने आया कि जिन आउटपेशेंट मरीज़ों को तीन दिनों का रेमडेसिविर कोर्स दिया गया, उनमें प्लेसबो की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने और मरने का खतरा काफ़ी हद तक कम होते देखा गया। रेमडेसिविर दो स्थितियों में दी जाती है: पहली, उन अस्पताल में भर्ती कोविड-19 मरीज़ों को जिन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत हो, इन्हें रेमडेसिविर इम्यूनोमॉड्यूलेटर्स के साथ दी जाती है।और दूसरी स्थिति में, उन उच्च-जोखिम वाले आउटपेशेंट मरीज़ों को एक दूसरे विकल्प की तरह दी जाति है जिनके लिए निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर सही न हो।

निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर (पैक्सलोविड) आमतौर पर पाँच दिनों तक मुँह के ज़रिए ली जाती है, और उच्च-जोखिम वाले और बिना टीके वाले मरीज़ों में इसके इस्तेमाल से अस्पताल में भर्ती होने और मरने का खतरा काफ़ी हद तक कम होते देखा गया हैWHO ने उन उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों के लिए जिन्हें अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत न हुई हो, निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर को फर्स्ट-लाइन ट्रीटमेंट बताया है।

आख़िर में, मोलनुपिराविर एक थर्ड-लाइन विकल्प है जो मुँह से ली जाती है। इसकी सलाह उन मरीज़ों को दी जाती है जो ऊपर बताई गई दोनों दवाओं तक या तो पहुँच नहीं पा रहे या उन्हें सहन नहीं कर पा रहे हैं। एक रैंडमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल में बिना टीके वाले वयस्कों के अस्पताल में भर्ती होने और मरने की दर में काफ़ी हद तक कमी देखी गई। हालाँकि टीका लगवा चुके लोगों में नतीजे उतने एक जैसे नहीं रहे, इससे यह पता चलता है कि टीका लगवा चुके लोगों पर इसका असर थोड़ा कम हो सकता है।

इन तीनों दवाओं की उपलब्धता अलग-अलग राज्यों, अस्पतालों, और स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। तीनों दवाओं में समय सबसे अहम है, क्योंकि सभी को बीमारी की शुरुआत में ही सबसे ज़्यादा असरदार पाया गया है। जाँच, निदान, या दवा लिखने में हुई देरी इलाज़ से मिलने वाले फ़ायदे की संभावना को सीधे तौर पर कम कर देती है।

इलाज़ में हिचकिचाहट को दूर करने के लिए मरीज़ों से बातचीत के तरीके

जब क्लिनिकल नज़रिये से इलाज़ की ज़रूरत और उसके फ़ायदे दोनों साफ़ हों, तब भी इलाज़ लेने में हिचकिचाहट क्यों बनी रहती है?

इलाज़ में देरी के पीछे कई वजहों का हाथ होता है। उनमें से एक आम वजह है “वॉच एंड वेट“, जहाँ मरीज़ कोविड-19 को गंभीरता से नहीं लेते और इलाज़ को टालते रहते हैं। दवाओं के साइड इफ़ेक्ट और उनकी आपस में रिएक्ट करने की संभावना को लेकर चिंताएँ भी अक्सर देखने को मिलती हैं, ख़ासतौर पर उन मरीज़ों में जो एक साथ कई दवाएँ ले रहे होते हैं।

इसके अलावा, इलाज़ के बारे में जागरूकता न होना और सही जानकारी तक पहुँच न होना भी मरीज़ों के समय पर इलाज़ लेने में हो रही देरी को और भी बढ़ा सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि निदान से पहले सिर्फ़ 54% वयस्कों ने पैक्सलोविड (निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर) जैसी दवा से इलाज़ के बारे में सुना था। ये सभी वजहें मिलकर मरीज़ों में अनिश्चितता पैदा करती हैं, जिससे वे इलाज़ लेने में हिचकिचाते हैं या उसे टालते रहते हैं।

तो फिर क्या अलग किया जा सकता है?

पहला, मरीज़ों को यह समझाएँ कि कोविड-19 की दवाएँ सिर्फ़ लक्षण कम करने के लिए नहीं हैं, बल्कि ये समय रहते लेने पर गंभीर बीमारी से बचाती हैं। एंटीवायरल दवाओं को महज़ इलाज़ की तरह नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी से बचाव के ज़रिए की तरह बताएँ, ताकि मरीज़ समझ सकें कि जल्दी इलाज़ लेने से गंभीर बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने का खतरा कम होता है।

दूसरा, मरीज़ के लिए फ़ैमिली डॉक्टर या किसी परिचित और भरोसेमंद डॉक्टर की सीधी और साफ़ सलाह बेहद ज़रूरी है। मरीज़ तब कहीं ज़्यादा तैयार होते हैं जब उनके फ़ैमिली डॉक्टर या कोई भरोसेमंद डॉक्टर इलाज़ की सलाह देते हैं और उन्हें यह भरोसा दिलाते हैं कि ये दवाएँ सुरक्षित हैं और उनकी मौजूदा दवाओं के साथ लेने में कोई दिक्कत नहीं होगी। आँकड़े बताते हैं कि फ़ैमिली डॉक्टर या किसी भरोसेमंद डॉक्टर द्वारा सलाह दिए जाने पर एंटीवायरल ट्रीटमेंट लेने को तैयार लोगों का प्रतिशत 20% से ज़्यादा बढ़ जाता है, और 65 साल या उससे ज़्यादा उम्र के वयस्कों में यह 93% तक पहुँच जाता है

आख़िर में, बिना इंतज़ार किए कोविड-19 के मरीज़ों से ख़ुद संपर्क करना और हर मरीज़ को एक तय मानक के अनुसार शिक्षित करना बेहद ज़रूरी है। मरीज़ शायद ही कभी खुद से इलाज़ माँगते हैं। अध्ययन बताते हैं कि जिन मरीज़ों को इलाज़ मिलना चाहिए, उनमें से 20% से भी कम ही ऐसे होते हैं जो इलाज़ के बारे में अच्छी तरह से जानते भी हैं और बिना किसी के कहे डॉक्टर से इलाज़ माँगने की पहल भी ख़ुद ही कर सकते हैं। डॉक्टरों को चाहिए कि निदान के तुरंत बाद ही ऐसे मरीज़ों (या उनके परिवारवालों) से संपर्क करें जिन्हें इलाज़ मिलना चाहिए, और उन्हें कोविड-19 से जुड़े जोखिम, इलाज़ के फ़ायदे, और आगे के कदमों के बारे में सीधी और व्यवस्थित जानकारी देनी चाहिए।

मुख्य बातें

कोविड-19 के लक्षण शुरू होने के पहले पाँच दिनों के भीतर शुरू किया गया इलाज़ उच्च-जोखिम वाले लोगों के लिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यह उनके अस्पताल में भर्ती होने और मरने के खतरे को काफ़ी हद तक कम कर सकता है, और इस बात को ट्रायल और रियल-वर्ल्ड में हुए अध्ययन मज़बूती से पुख्ता करते हैं। निर्माट्रेलविर/रिटोनाविर, रेमडेसिविर, और मोलनुपिराविर जैसी एंटीवायरल थेरेपी जल्दी दिए जाने पर सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद होती हैं, और इलाज़ का चुनाव मरीज़ की स्थिति और दवाओं की उपलब्धता पर निर्भर करता है। इन सब फ़ायदों के स्पष्ट तौर पर सामने होने के बावजूद, इलाज़ के प्रति कम जागरूकता और हिचकिचाहट की वजह से देरी होती रहती है। समय पर डॉक्टरी सलाह, मरीज़ों का बिना इंतज़ार किए ख़ुद उनसे संपर्क करना, और एंटीवायरल दवाओं को गंभीर बीमारी से बचाव के ज़रिए की तरह समझाना, यही ज़्यादा मरीज़ों तक इलाज़ पहुँचाने और उनकी सेहत सुधारने की असली चाबी है।

कुछ प्रैक्टिकल सुझाव

  • जल्दी इलाज़ को प्राथमिकता दें

एंटीवायरल दवाएँ लक्षण शुरू होने के पहले पाँच दिनों में सबसे ज़्यादा असरदार होती हैं। मरीज़ की हालत बिगड़ने का इंतज़ार न करें। यह पक्का करें कि उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों के पास घर पर जाँच किट हो या नज़दीकी जाँच केंद्र की जानकारी हो, और वे पॉज़िटिव आने के पहले दिन ही डॉक्टर से संपर्क करें, ताकि तुरंत इलाज़ शुरू किया जा सके।

  • संवेदनशील मरीज़ों पर ध्यान दें

मधुमेह, हृदय रोग, लंबे समय से चली आ रही गुर्दे की बीमारी, या 30 से ज़्यादा बीएमआई वाले वयस्कों पर ख़ास ध्यान दें। ऐसे मरीज़ शुरू में अक्सर ठीक महसूस करते हैं, लेकिन उनमें अचानक हालत बिगड़ने का सबसे ज़्यादा खतरा होता है। जल्दी शुरू किया गया इलाज़ उनके लिए अस्पताल में भर्ती होने से बचाव का सबसे बेहतर उपाय है।

  • जल्दी पहचान और स्क्रीनिंग करें

अपने मरीज़ों की सूचियों को सक्रिय रूप से देखें और सबसे ज़्यादा जोखिम वाले मरीज़ों की पहचान करें। लक्षण दिखाई देते ही जल्दी निदान के लिए एक साफ़ “फ़ास्ट-ट्रैक” प्रोटोकॉल बनाएँ। सही मरीज़ों की समय रहते पहचान करना ही उनकी हालत बिगड़ने से बचाने की नींव है।

  • इलाज़ को बचाव के रूप में समझाएँ

अगर मरीज़ आज ठीक महसूस कर रहे हैं, तो हो सकता है कि उन्हें दवा ज़रूरी न लगे। उन्हें समझाएँ कि इलाज़ का मकसद सिर्फ़ उनकी खाँसी ठीक करना नहीं है, बल्कि उन्हें कल अस्पताल में भर्ती होने से बचाना है। उन्हें घर पर परिवार के साथ ही रखना इलाज़ के लिए प्रेरित करने का सबसे असरदार तरीका है।

  • दवा लिखने में हो रही देरी को कम करें

मरीज़ की मौजूदा दवाओं और उनके कॉन्ट्राइंडिकेशंस, और यह कि मरीज़ को इलाज़ की ज़रूरत है या नहीं, इन सबकी जाँच जल्द से जल्द करें। दवा लिखने के आसान तरीके और मरीज़ की मौजूदा दवाओं की जल्दी जाँच-पड़ताल से उच्च-जोखिम वाले मरीज़ों को इलाज़ का सही मौका हाथ से जाने से पहले ही एंटीवायरल ट्रीटमेंट शुरू करने में मदद मिल सकती है।

अनुवादक: शेषन तिवारी

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