डोमिनिका क्वास्नित्स्का, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया और रिज़मीना रिलवान, श्रीलंका से स्वतंत्र शोधकर्ता
कोविड-19 के एक्यूट फ़ेज़ पर तो दुनिया भर का ध्यान रहा है, लेकिन कोविड-19 से शरीर पर पड़ने वाले लॉन्ग-टर्म असर को अब क्लिनिकल प्रैक्टिस में भी तेज़ी से पहचाना जा रहा है। WHO कुछ खास आबादियों को SARS-CoV-2 इन्फेक्शन के बाद पोस्ट-कोविड-19 कंडीशन होने के उच्च-जोखिम में देखता है। इनमें महिलाएँ, बुज़ुर्ग, धूम्रपान करने वाले, अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त लोग, पहले से मौजूद लंबी बीमारियों वाले लोग, और दिव्यांग लोग शामिल हैं।
कई लोग इन्फेक्शन के हफ़्तों या महीनों बाद भी लक्षणों का अनुभव करते रहते हैं, जबकि कुछ लोगों में पहले से मौजूद बीमारियाँ और बिगड़ जाती हैं या नई लंबी बीमारियाँ हो जाती हैं। इससे शरीर पर पड़ने वाले लॉन्ग-टर्म असर को समझना ज़रूरी है ताकि लोगों को और ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों और पहले से लंबी बीमारी होने के खतरे से जूझ रहे लोगों को एक असरदार और मरीज़ की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर दी जाने वाली देखभाल (पेशेंट-सेंटर्ड केयर) मिल सके। डॉक्टरों के लिए इसका मतलब है कि एक्यूट मैनेजमेंट से आगे बढ़कर, मरीज़ की लगातार निगरानी, बीमारी से बचाव, और मिलकर की जाने वाली देखभाल की योजना बनाने पर ध्यान दें।
लॉन्ग कोविड क्या है? एक जटिल और बदलती कंडीशन को समझना
लॉन्ग कोविड को पोस्ट-कोविड-19 कंडीशन भी कहा जाता है। इसका मतलब है: SARS-CoV-2 इन्फेक्शन के शुरुआती दौर के 3 महीने बाद भी लक्षणों का बने रहना या नए लक्षणों का सामने आना, और इन लक्षणों का कम से कम 2 महीने तक बिना किसी और वजह के बने रहना (यह WHO की परिभाषा है और अलग-अलग संस्थाओं में यह थोड़ी अलग हो सकती है)। इसके आम लक्षणों में थकान, साँस फूलना, कॉग्निटिव दिक्कतें (“ब्रेन फ़ॉग”), सीने में दर्द, और नींद में गड़बड़ी शामिल हैं। ये लक्षण घटते-बढ़ते रह सकते हैं और अक्सर एक साथ कई अंगों को प्रभावित करते हैं। डॉक्टरों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इन लक्षणों की कोई एक स्पष्ट पहचान नहीं होती और इनके लिए अक्सर पूरे शरीर के अंगों को ध्यान में रखकर की जाने वाली एक व्यापक जाँच की ज़रूरत पड़ती है।
लॉन्ग कोविड कितने लोगों को होता है, इसके अनुमान अलग-अलग हैं, लेकिन यह बुज़ुर्गों, पहले से बीमारियों से जूझ रहे लोगों, और कोविड के शुरुआती इन्फेक्शन में गंभीर रूप से बीमार पड़ने वाले लोगों में ज़्यादा आम लगता है। हालाँकि, यह उन लोगों को भी हो सकता है जिन्हें कोविड-19 हल्के रूप में हुआ हो या जिनमें कोई लक्षण ही न रहे हों, जो इसे एक व्यापक और अप्रत्याशित कंडीशन बनाता है।कोविड-19 कैसे लंबी बीमारियों के खतरे को बदल रहा है
नई और सामने आ रही जानकारी बताती है कि कोविड-19 का संबंध लंबी बीमारियों के पनपने या बिगड़ने से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए, कुछ मरीज़ों में इन्फेक्शन के बाद पहली बार मधुमेह सामने आता है, जो शायद पैंक्रियाज़ पर वायरस के असर या सूजन से जुड़े मेटाबॉलिक बदलावों की वजह से होता है। इसी तरह, हृदय की माँसपेशियों को नुकसान (माइओकार्डियल इंजरी), दिल की धड़कन में गड़बड़ी (अरिदमिया), और दिल फेल होने का बढ़ता खतरा जैसी हृदय से जुड़ी पेचीदगियाँ एक्यूट फ़ेज़ से ठीक होने के बाद भी देखी गई हैं। इसलिए, कार्डियोमेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों की लगातार निगरानी पोस्ट-कोविड देखभाल का एक अहम हिस्सा है।
ये संबंध इस बात की ज़रूरत को उजागर करते हैं कि कोविड-19 को सिर्फ़ एक साँस से जुड़े एक्यूट इन्फेक्शन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी कंडीशन के रूप में भी देखा जाए जो पूरे शरीर पर लंबे समय तक असर डालती है। जो मरीज़ पहले से किसी लंबी बीमारी के साथ जी रहे हैं, उनमें कोविड-19 बीमारी को तेज़ी से बढ़ा सकता है या उसके इलाज़ और देखभाल को और मुश्किल बना सकता है।
कोविड-19 के बाद बुज़ुर्गों की ज़िंदगी
बुज़ुर्गों पर कोविड-19 के एक्यूट और लॉन्ग-टर्म असर, दोनों का बोझ असमान रूप से ज़्यादा पड़ा है। 65 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों में लॉन्ग कोविड के लक्षण और पेचीदगियाँ युवा वयस्कों की तुलना में ज़्यादा देखी जाती हैं। इसके अलावा, कोविड-19 पहले से मौजूद लंबी बीमारियों, जैसे कि हृदय और साँस से जुड़ी बीमारियाँ और न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर, को शुरू भी कर सकता है और बिगाड़ भी सकता है।
मेडिकल पेचीदगियों से परे, कई बुज़ुर्गों में रोज़ के काम-काज की क्षमता में गिरावट आती है, जिसमें चलने-फिरने की क्षमता कम होना, माँसपेशियों की कमज़ोरी, और खुद काम करने की क्षमता का कम होना शामिल है। बीमारी के दौरान और बाद में लोगों से कटाव कॉग्निटिव गिरावट और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतों, जैसे कि अवसाद और चिंता, को और बढ़ा सकता है। इससे उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की क्वालिटी पर अक्सर गहरा असर पड़ता है। ऊपर से ठीक लगने के बाद भी, बुज़ुर्ग मरीज़ पहले जैसी ज़िंदगी में वापस आने के लिए संघर्ष कर सकते हैं, और उन्हें डॉक्टरों, परिवारवालों या देखभालकर्ताओं, और सामुदायिक सेवाओं से भी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। इस आबादी में रोज़मर्रा की क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य, और सामाजिक सहायता की नियमित जाँच ख़ासतौर पर ज़रूरी है।
लॉन्ग कोविड में टीम-बेस्ड और लॉन्ग-टर्म देखभाल क्यों ज़रूरी है
इतनी तरह की पोस्ट-कोविड पेचीदगियों के होते हुए, देखभाल के लिए एक मल्टीडिसिप्लिनरी नज़रिया बेहद ज़रूरी है। इसमें जनरल फिजिशियन, स्पेशलिस्ट डॉक्टर (जैसे कि कार्डियोलॉजिस्ट या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट), फ़िज़ियोथेरेपिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, और सोशल वर्कर की मदद शामिल हो सकती है। नियमित फ़ॉलो-अप से नई या बिगड़ती बीमारियों की जल्दी पहचान हो सकती है और समय पर इलाज़ संबंधी ज़रूरी कदम उठाना संभव हो जाता है। रेफ़रल के स्पष्ट रास्ते और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बातचीत के तय तरीके बनाने से देखभाल की निरंतरता बेहतर हो सकती है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि हर मरीज़ की देखभाल उसकी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से होनी चाहिए। लॉन्ग कोविड के मरीज़ों में अक्सर अलग-अलग और एक-दूसरे से जुड़े लक्षण देखे जाते हैं, और उनके ठीक होने का सफ़र भी काफ़ी अलग-अलग हो सकता है। लॉन्ग कोविड से जुड़े पहलुओं को पहले से चल रही लंबी बीमारियों के इलाज़ और देखभाल की योजना में शामिल करने से नतीजे बेहतर हो सकते हैं और आगे होने वाली पेचीदगियों का खतरा कम हो सकता है। मरीज़ से या उनके परिवारवालों से मिलकर फ़ैसले लेना और लक्ष्य तय करना, देखभाल को मरीज़ की प्राथमिकताओं और क्षमताओं के अनुसार ढालने में मदद कर सकता है।
आगे बढ़ते हुए: प्रैक्टिस में जागरूकता, आत्मविश्वास, और निरंतरता बनाना
कोविड-19 से शरीर पर पड़ने वाले लॉन्ग-टर्म असर को पहचानने और उनसे निपटने में डॉक्टर एक अहम भूमिका निभाते हैं। मरीज़ों में जागरूकता बढ़ाना, उनके लक्षणों को गंभीरता से लेना, और स्पष्ट सलाह देना, अनिश्चितता को कम करने और देखभाल में मरीज़ की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकता है। मरीज़ों के साथ लॉन्ग कोविड के बारे में बातचीत करने में अपना आत्मविश्वास बढ़ाना प्रैक्टिस का एक अहम हिस्सा है।
जैसे-जैसे इस क्षेत्र में रिसर्च आगे बढ़ती जा रही है, अपडेटेड रहना और बदलाव के साथ ढलते रहना ज़रूरी है। कोविड-19 का लॉन्ग-टर्म बोझ आने वाले कई सालों तक बना रहने की संभावना है., इसलिए इसे लंबी बीमारियों के इलाज़ और देखभाल का एक स्थायी और अहम हिस्सा मानना ज़रूरी है। डॉक्टरों की लगातार होने वाली प्रोफ़ेशनल एजुकेशन (इस ट्रेनिंग को लेकर) और नई और सामने आ रही जानकारी को प्रैक्टिस में शामिल करना, मरीज़ों के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए बेहद ज़रूरी होगा।
कुछ प्रैक्टिकल सुझाव
- मरीज़ों से कोविड-19 के बाद भी बने रहने वाले लक्षणों के बारे में आगे बढ़कर ख़ुद पूछें
नियमित परामर्श के दौरान, मरीज़ों से कोविड-19 के बाद भी बने रहने वाले लक्षणों के बारे में आगे बढ़कर ख़ुद पूछें, चाहे शुरुआती इन्फेक्शन हल्का ही क्यों न रहा हो। थकान, साँस फूलना, और कॉग्निटिव बदलाव अक्सर कम सामने आते हैं। सटीक सवाल पूछने से जल्दी पहचान, समय पर जाँच, और ज़रूरत पड़ने पर रेफ़रल संभव हो पाता है।
- नई या बिगड़ती लंबी बीमारियों की स्क्रीनिंग करें
नई या बिगड़ती लंबी बीमारियों पर नज़र रखें, जैसे कि पहली बार सामने आने वाला मधुमेह, हृदय से जुड़ी पेचीदगियाँ, या पहले से मौजूद बीमारियों का बिगड़ना। इसमें ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, और दिल से जुड़े लक्षणों की जाँच शामिल हो सकती है। इस स्क्रीनिंग को पोस्ट-कोविड फ़ॉलो-अप में शामिल करने से पेचीदगियों की जल्दी पहचान हो सकती है।
- बुज़ुर्गों में धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधि की तरफ़ वापसी को बढ़ावा दें
बुज़ुर्गों में धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधि की तरफ़ वापसी को बढ़ावा दें, जो मरीज़ की क्षमता के हिसाब से तय हो। रिहैबिलिटेशन और गतिविधि की योजना हर मरीज़ की ज़रूरत के हिसाब से बनाई जानी चाहिए, क्योंकि कुछ मरीज़ों में ज़्यादा मेहनत करने पर लक्षण बिगड़ सकते हैं। फ़िज़ियोथेरेपी या रिहैबिलिटेशन सेवाओं के लिए रेफ़रल से चलने-फिरने की क्षमता, ताक़त, और आत्मनिर्भरता में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, ख़ासतौर पर उन मरीज़ों में जो लंबे समय तक लोगों से कटे रहे हों, कॉग्निटिव और मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग पर भी ध्यान दें।
- मल्टीडिसिप्लिनरी नज़रिया अपनाएँ
जहाँ संभव हो, अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच देखभाल का तालमेल बनाएँ। जटिल या लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों वाले मरीज़ों को मेडिकल, अलाइड हेल्थ, और साइकोसोशल सेवाओं की मिली-जुली मदद से फ़ायदा हो सकता है। देखभाल में बिखराव से बचने के लिए सेवा प्रदाताओं के बीच साफ़ बातचीत बेहद ज़रूरी है।
- मरीज़ों को भरोसा दिलाएँ और उनकी हकीकत पर आधारित उम्मीदें तय करने में मदद करें
लॉन्ग कोविड से ठीक होने की प्रक्रिया धीमी और अनिश्चित हो सकती है। मरीज़ों की चिंताओं को समझें, उनके अनुभवों को गंभीरता से लें, और आगे क्या हो सकता है इसके बारे में स्पष्ट जानकारी दें। सेल्फ-मैनेजमेंट के तरीकों में मदद करना और नियमित फ़ॉलो-अप से मरीज़ों को अपने ठीक होने के सफ़र पर ज़्यादा काबू महसूस करने में मदद मिल सकती है।
अनुवादक: शेषन तिवारी